आज चाँद
ढूध के कटोरे सा लग रहा है
कुछ बादलों के पीछे से झांकता
मनो
तुम खुद ओट के पीछे से देखती मुझे
अपने केश भिगोये
ये सब तारे
जो आज नभ में
चमक रहे हैं
जैसे तू मुस्काती
या किसी ने काली चादर पर मोती
चुन चुन के पिरोये
चिड़िया जो गाती ये
सुरमई सब गीत
पवन के झोंको में पत्ते सरसराते
फिर दिलाते तेरी याद
मै देखता तेरी राह
आंखें ये भिगोये
पर अब
चाँद छिपा
तारे दुबे
पंची चुप
पवन रुक
क्यूँ गयी है
मनो सब हैं अब आँख मूंद कर सोये