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Wednesday, July 14, 2010

उस दिन

आज चाँद
ढूध के कटोरे सा लग रहा है
कुछ बादलों के पीछे से झांकता
मनो
तुम खुद ओट के पीछे से देखती मुझे
अपने केश भिगोये

ये सब तारे
जो आज नभ में
चमक रहे हैं
जैसे तू मुस्काती
या किसी ने काली चादर पर मोती
चुन चुन के पिरोये

चिड़िया जो गाती ये
सुरमई सब गीत
पवन के झोंको में पत्ते सरसराते
फिर दिलाते तेरी याद
मै देखता तेरी राह
आंखें ये भिगोये

पर अब
चाँद छिपा
तारे दुबे
पंची चुप
पवन रुक
क्यूँ गयी है
मनो सब हैं अब आँख मूंद कर सोये

Friday, June 25, 2010

याद....( ग़ज़ल)

इक रात यूँ ही बैठे तुम नज़र आई
कभी राहगीर तो कभी रहगुज़र बन आई
हम आज भी तेरा इंतज़ार करते हैं
तेरे हर ख्याल पे क्यों ये आँख भर आई

इक अरसा हो गया है तुमसे बिछड़े हुए अब तो
न तुम आई न तेरी कोई खबर आई
दरवाज़ा अब भी तेरी राह तकता है
इंतज़ार में दिन बीते रात अक्सर उतर आई

शायद मुझ को मालूम न था कुछ भी
तेरे जाते ही मेरी हर दुआ बेअसर बन आई
तू मुझसे दूर रह के भी मेरे ही पास रहती है
अब हर शब् भी तेरे जाने पे सेहर बन आई

कुछ लोग कहते हैं की में "बावला" सा हूँ
न जाने क्यूँ तेरे आते ही ये रंगत निखर आई
इक झलक तेरी देखे ज़माना हो गया है अब
दिन में साँसे चलती हैं यादें रात भर आई
यादें रात भर आई ....
यादें रात भर आई ....