Thursday, November 5, 2009

मृत्यु के सन्दर्भ में .....

मृत्यु
प्रशन बस इतना ....
क्या होता है
जीते जी मरना...

तटस्थता के चरम पे सब
मौत आ जाए न जाने कब
प्रशन बस इतना
क्या होता है
जीते जी मरना ...

आँखों के ताल में आंसू तैरते
उनको मैं घुट घुट पीता
रहता हूँ फ़िर भी
जीता मैं फ़िर भी
पर क्यों
??
मृत्यु प्रशन बस इतना
क्या होता है
जीते जी मरना...


हस्त मैं
पर मन है ये रोता
प्रत्यक्ष अब
स्वयं के समक्ष
जब मैं स्वयं को मरता पाता
मृत्यु....
हे मृत्यु ....
प्रशन बस इतना
क्या होता है
जीते जी मरना


आत्मग्लानी होती है अब
चुप चुप मैं रोता हूँ जब
क्यों
क्यों
मैं ही हूँ मर्मान्तक पीड़ा का भागी
फ़िर भी
मृत्यु....
प्रशन बस इतना ......
क्या होता है.....
जीते जी मरना .........
क्या होता
है
जीते
जी मरना ॥

3 comments:

  1. nice...beech beech mein rhythm break ho jati hai..but still very nice..gambhir..

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