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Thursday, March 10, 2011

मुट्ठी भर सपने .....

मुट्ठी भर सपने
अपनी जेब में लिए
हाँ
मुट्ठी भर सपने
अपनी जेब में लिए
निकल चूका हूँ
इन राहों पर
की न जाने कहाँ
टूट जायें
बिखर जायें
मेरे मुट्ठी भर सपने
सपने मेरे

सपना
हाँ
सपना था
घड़ा भर कंचे जोड़ने का
पेड़ों से आम तोड़ने का
पत्थर से गगन फोड़ने का
सपना था
नदी को पलट मोड़ने का
पतंग से व्योम नापने का
हवा से तेज़ भागने का
सपना था
छत से चाँद ताकने का
नभ पर तारे टांगने का
बारिश में भीग नाचने का
सपना था ...
क्यों
मुठी कुछ बड़ी हो गयी
नहीं
बस मुट्ठी भर सपने
संजोये बड़े मन से
की न जाने कब
टूट जायें
बिखर जायें
मेरे
अपने
मुठी भर सपने ,....

Wednesday, September 29, 2010

कौन है वो --2

हर रोज़ उसे मैं देखता हूँ
आँखें नीचे
बाल संभाले
अपने अंगो को
ध्यान से धाके
मुह सिये
चुपचाप जिए
वो कौन है
कौन है वो
क्या वो माँ बन पाएगी
??
क्या वो औरत कहलाएगी
??
वह तो है बस बच्चा जनने की
एक मशीन
न है माता
न है गृहणी
न है पत्नी
है तो बस
एक मशीन
जिसके पुर्जे ढीले पड़े तो
रखो किसी स्टोररूम में
जब एक नयी मशीन
उसकी जगह न ले ले
बाज़ार सजा है मशीनों से
गोरी
काली
गाने वाली
चौका बर्तन करने वाली
पौडर लिपस्टिक और है लाली
जब तक दमकता है चेहरा
तब तक काम की लगती है
झुरियों वाली मशीन भला किसे पसंद है
पड़ी रहे किसी स्टोररूम में
आँखे मूंदे
न है माता
न है गृहणी
न है पत्नी
है तो बस
एक मशीन
जो बच्चा जने
बिस्तर सेके
रोटी बनाये
पिरस खिलाये
लात भी कहए
चलती जाए
थक हार के फिर से
मन बहलाए
चलती जाए
चलती जाए
कौन है वो
औरत अबला नारी
या एक
"मशीन"
........

एक अधूरी कविता ...

मेज़
पर पड़ी ...
टूटी हुई सेठी की कलम
वो आधी बिखरी श्याही की दवात
कुछ पन्ने ईंट से दबे
कुछ फडफडाते- छटपटाते
मेरी तरह
कुछ फडफडाते- छटपटाते
मेरी तरह
रुके है अब भी
आँखों में आंसू
और अधरों पे शब्दों की तरह
एक अधूरी कविता
पूरी करनी है
पर लालटेन आखिरी सांसें ले रही है
मेरी तरह
मरने से पहले मुझमे सहस आया
लौ ने भी साथ निभाया
कलम थामा
चाभी का एक पुराना छल्ला
लटका था सिरहाने
कुछ चाभियाँ
शायद कोई राज़ खोले
एक टूटी ऐनक
जो टिकी रहती थी कानो के सिरहाने
कुछ टूटे पैसे बिखरे
शायद मेरे टूटे बिखरे
सपने खरीदे
कलम थमा
बस लिखा
क्या
??
"माँ"
....